Hamirpur : आज़ादी के 75 साल बाद भी सड़क की आस,गर्भवती को बैलगाड़ी से ले जाना पड़ा अस्पताल

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हमीरपुर जिले के मौदहा विकासखंड के परसदवा डेरा गऊघाट छानी गांव में शनिवार को हुई एक दर्दनाक घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया। यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही 23 वर्षीय रेशमा को उसके ससुर कृष्ण कुमार केवट (60) को कीचड़ और दलदल से भरे पथरीले रास्ते पर बैलगाड़ी में बैठाकर अस्पताल ले जाना पड़ा। यह 7 किलोमीटर की दूरी उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं थी। हर झटके के साथ रेशमा की कराह गांव के सन्नाटे को चीरती रही, और ससुर की आंखों में सिर्फ उम्मीद झलकती रही कि किसी तरह बहू को समय पर इलाज मिल जाए।

बरसात के मौसम में गांव से सिसोलर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना किसी जोखिम भरे सफर से कम नहीं। सड़कों पर कीचड़, गड्ढे और दलदल इतने हैं कि चारपहिया वाहन तो दूर, एम्बुलेंस तक पहुंचना नामुमकिन हो जाता है। तीन घंटे की मशक्कत के बाद जब रेशमा अस्पताल पहुंची तो डॉक्टरों ने बताया कि प्रसव की तिथि दो दिन बाद की है। प्राथमिक उपचार के बाद उसे घर भेज दिया गया।

थके और टूटे स्वर में कृष्ण कुमार बोले, “अगर सड़क होती या एम्बुलेंस यहां तक पहुंच पाती, तो बहू को इस हालत में बैलगाड़ी में नहीं लाना पड़ता। हर बरसात यह रास्ता जान लेने पर आमादा रहता है।” इस घटना ने पूरे गांव को झकझोर दिया है। आसपास के करीब 500 से अधिक ग्रामीण हर वर्ष इसी परेशानी का सामना करते हैं।

ग्राम पंचायत के युवा समाजसेवी अरुण निषाद (राजेंद्र कुमार) ने बताया कि उन्होंने 12 मार्च 2024 को सड़क निर्माण की मांग को लेकर छह दिन का अनिश्चितकालीन धरना दिया था। उपजिलाधिकारी रमेशचंद्र ने लोकसभा चुनाव के बाद काम शुरू करने का आश्वासन दिया था, लेकिन डेढ़ साल बीतने के बाद भी सड़क अब तक कागजों में ही दबी है।

गांववासियों ने अब जिला प्रशासन, स्थानीय विधायक और मुख्यमंत्री कार्यालय से गुहार लगाई है कि जल्द से जल्द पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए। उनका कहना है कि सड़क केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की डोर है जो हर बरसात में टूटने लगती है।

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