Bihar Mahagathbandhan Analysis: बिहार चुनाव 2025 में एनडीए की भारी जीत और महागठबंधन की करारी हार ने कई सवाल खड़े कर दिए। तेजस्वी यादव का ‘तेजस्वी प्रण’ न असर दिखा सका, न ही गठबंधन में भरोसा बन पाया। सीट बंटवारे की देरी, तुष्टिकरण और ‘जंगलराज’ की छवि, यादव केंद्रित राजनीति, और एनडीए की एकजुट रणनीति जैसे छह बड़े कारण महागठबंधन की हार की जड़ माने जा रहे हैं।

महागठबंधन बुरी तरह क्यों हारा?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने साफ बता दिया है कि जनता इस बार स्थिर और भरोसेमंद सरकार चाहती थी। एनडीए (NDA) ने 200 से ज्यादा सीटों पर बढ़त हासिल कर ली, जबकि राजद (RJD) के नेतृत्व वाले महागठबंधन की स्थिति बेहद कमजोर दिखी। केवल 38 सीटों पर बढ़त और पूरे प्रदेश में ढहती उम्मीदों ने विपक्षी गठबंधन को बड़ा झटका दिया। जनसुराज (Jansuraj) भी एक भी सीट नहीं निकाल सका, जिससे विपक्ष का वोट और बिखर गया। लेकिन महागठबंधन की हार के असली कारण क्या थे? आइए समझते हैं छह बड़े कारण।

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हवा-हवाई वादे, लेकिन फंडिंग प्लान गायब
तेजस्वी यादव ने हर घर नौकरी, महिलाओं को सहायता और पेंशन जैसे बड़े वादे किए। लेकिन जनता जानना चाहती थी कि पैसे कहां से आएंगे? कब और कैसे ये योजनाएँ लागू होंगी? महागठबंधन की ओर से कोई ठोस रोडमैप नहीं दिया गया। “ब्लूप्रिंट बाद में आएगा”—यह वाक्य खुद महागठबंधन की विश्वसनीयता कम करने लगा। दूसरी तरफ एनडीए ने इन्हीं वादों को “हवा-हवाई” कहकर प्रचार में बड़ा मुद्दा बना दिया।

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सीट बंटवारे पर खींचतान और भरोसे की कमी
राजद, कांग्रेस और वाम दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर खूब विवाद हुआ। सीटों का एलान देरी से हुआ, जिससे जमीन पर तैयारी कमजोर रही। घोषणापत्र को ‘तेजस्वी प्रण’ नाम देना भी सहयोगियों को पसंद नहीं आया। महागठबंधन का यह असंतुलन पूरे चुनाव में दिखता रहा और अंत में इसका नुकसान वोटों में साफ झलक गया।

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‘जंगलराज’ और ‘मुस्लिम परस्त’ छवि का नुकसान
राजद के पुराने दौर की छवि अब भी वोटरों के दिमाग में ताज़ा है। एनडीए ने लगातार लालू राज और जंगलराज के मुद्दों को हवा दी। मुस्लिम-बहुल सीटों पर महागठबंधन मजबूत रहा, लेकिन पूरे प्रदेश में यह छवि नुकसानदायक बन गई। उधर चुनाव प्रचार के दौरान ‘कट्टा’ वाले बयान और दबंगई के वीडियो ने मध्यम वर्ग के वोटों को एनडीए की ओर धकेल दिया।

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यादव-केंद्रित टिकट बंटवारा उलटा पड़ा
144 सीटों में से 52 यादव उम्मीदवार उतारना राजद की रणनीति तो थी, लेकिन इससे जातिवादी छवि और मजबूत हुई। गैर-यादव, अगड़े और अति पिछड़े वोट इस रणनीति से दूर हो गए। बीजेपी ने इसे “यादव राज” का नैरेटिव बनाकर खूब भुनाया।

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एनडीए की एकजुटता, मोदी फैक्टर और नीतीश पर भरोसा
एनडीए ने सीट बंटवारे और प्रचार में एकजुटता दिखाते हुए स्पष्ट संदेश दिया—नीतीश ही चेहरा हैं। मोदी की रैलियों ने BJP-NDA के नैरेटिव को मजबूती दी, जबकि महागठबंधन खेमे में आपसी असंतुलन ने उसे कमजोर किया।

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चुनावी पोस्टरों में लालू यादव की छोटी तस्वीर
नया चेहरा दिखाने की कोशिश में राजद ने पोस्टरों में लालू की तस्वीर छोटी कर दी। इससे पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा हुई। एनडीए ने इसे “जंगलराज के पाप छिपाने की कोशिश” बताया, और लोग इस नैरेटिव से प्रभावित भी हुए।

बिहार चुनाव 2025 में एनडीए (NDA) की अभूतपूर्व जीत के बाद दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में जश्न का माहौल चरम पर रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक बिहारी अंदाज में लाल-चेक वाले गमछा (Gamchha) को हवा में लहराकर कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें