MP High Court: 3 साल की बच्ची को संथारा दिलाने पर केंद्र, राज्य सरकार समेत परिजन को नोटिस जारी, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
हाइलाइट्स
- 3 वर्षीय बच्ची को था ब्रेन ट्यूमर
- धार्मिक उपवास रख दिलाया संथारा
- गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स बनाया
MP High Court 3 Year Old Santhara Case: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर डिवीजन बेंच ने तीन साल की बच्ची वियाना जैन को संथारा दिलाकर मौत के हवाले किए जाने के मामले में जनहित याचिका पर कड़ा रुख अपनाया है।
मंगलवार को हुई सुनवाई में इंदौर डिवीजन बेंच ने केंद्रीय गृह मंत्रालय, विधि मंत्रालय, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चेयरमैन, मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव, डीजीपी, इंदौर कमिश्नर, पुलिस कमिश्नर, कलेक्टर और बच्ची के माता वर्षा जैन और पीयूष जैन को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है। याचिका एडवोकेट शुभम शर्मा द्वारा पेश की गई, जिसे हाईकोर्ट की डबल बेंच जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस बिनोद कुमार द्विवेदी ने स्वीकार कर सुनवाई शुरू की।
क्या है ये पूरा मामला ?
दरअसल, वियाना जैन नाम की 3 वर्षीय बच्ची ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित थी। परिजन उसे इंदौर के एक आध्यात्मिक संत के पास दर्शन के लिए ले गए। संत ने कथित रूप से भविष्यवाणी की कि बच्ची की अगले दिन मृत्यु हो जाएगी। इसके बाद उसे संथारा (धार्मिक उपवास मृत्यु) दिलाया गया। ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ ने इसे सबसे कम उम्र की संथारा मृत्यु मानते हुए सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया।
क्या है याचिका का उद्देश्य ?
याचिकाकर्ता प्रांशु जैन द्वारा दाखिल जनहित याचिका में मांग की गई है कि नाबालिग बच्चों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों को संथारा दिलाना गैरकानूनी घोषित किया जाएं। धार्मिक परंपराओं के नाम पर मासूमों के जीवन से खिलवाड़ रोका जाएं।
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क्या बच्ची में समझ थी ?
याचिकाकर्ता प्रांशु जैन का तर्क है कि क्या तीन साल की बच्ची की धार्मिक मंशा और संकल्प को समझने की क्षमता थी ? क्या अभिभावकों को यह अधिकार है कि वे किसी नाबालिग के जीवन पर धार्मिक निर्णय लें ? क्या धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर जीवन के अधिकार का हनन हो रहा है ?
क्या हो सकता है आगे ?
हाईकोर्ट ने अब सभी पक्षों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। यदि कोर्ट ने याचिका के बिंदुओं को गंभीरता से माना, तो संथारा जैसे धार्मिक अनुष्ठानों पर कानूनी सीमाएं तय की जा सकती हैं, खासकर नाबालिगों के संदर्भ में।
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