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जिस घड़ीसाज़ को राजा ने जेल में डाल दिया, उसी की बनाई घड़ी ने बचाई राजकुमारी की जान

Published On: November 2, 2026
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राजमहल की सबसे कीमती घड़ी अचानक बंद हो गई थी। राजा ने पूरे राज्य के कारीगरों को बुलाया, लेकिन कोई उसे ठीक नहीं कर पाया। तभी एक बूढ़े घड़ीसाज़ ने कहा, “महाराज, यह घड़ी खराब नहीं हुई है, बल्कि यह आपको आने वाले एक बड़े खतरे की चेतावनी दे रही है।”

राजा ने उसकी बात सुनने के बजाय उसे जेल में डाल दिया। लेकिन कुछ ही घंटों बाद महल में ऐसी घटना हुई, जिसने सभी को हैरान कर दिया।

कहानी

बहुत समय पहले आनंदगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। वहाँ महाराज विक्रमदेव का शासन था। उनका एक विशाल महल था, जिसमें सोने-चाँदी की अनगिनत वस्तुएँ थीं। महल की सबसे अनमोल चीज एक विशाल घड़ी थी, जिसे लगभग सौ वर्ष पहले एक महान कारीगर ने बनाया था।

कहा जाता था कि उस घड़ी की आवाज पूरे महल में सुनाई देती थी और वह कभी गलत समय नहीं बताती थी।

राजा को उस घड़ी पर बहुत गर्व था।

उसी राज्य में गोविंद नाम का एक बूढ़ा घड़ीसाज़ रहता था। उसकी छोटी-सी दुकान बाजार के आखिरी छोर पर थी। दुकान में पुरानी घड़ियाँ, छोटे औजार और लकड़ी के कुछ डिब्बे रखे रहते थे।

गोविंद का एक बेटा था, जो बचपन में ही बीमारी के कारण चल बसा था। उसकी पत्नी भी कुछ वर्षों पहले दुनिया छोड़ चुकी थी। अब वह अकेला रहता था और अपना पूरा समय घड़ियाँ ठीक करने में बिताता था।

गोविंद के बारे में एक खास बात प्रसिद्ध थी। वह किसी भी घड़ी को खोलने से पहले उसे कुछ देर ध्यान से सुनता था।

लोग उससे पूछते, “बाबा, आप घड़ी को देखते कम और सुनते ज्यादा क्यों हैं?”

वह मुस्कराकर कहता, “हर मशीन की अपनी एक आवाज होती है। जो उस आवाज को समझ लेता है, वह उसकी परेशानी भी समझ जाता है।”

एक दिन अचानक राजमहल की विशाल घड़ी बंद हो गई।

राजा ने तुरंत आदेश दिया कि राज्य के सबसे अच्छे कारीगरों को बुलाया जाए।

दस कारीगर आए। किसी ने उसके पहिए बदले, किसी ने उसके भीतर के पुर्जे साफ किए, लेकिन घड़ी दोबारा नहीं चली।

राजा क्रोधित हो गया।

“क्या पूरे राज्य में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो इस घड़ी को ठीक कर सके?”

तभी एक सैनिक ने गोविंद का नाम सुझाया।

गोविंद को महल बुलाया गया।

उसने घड़ी के पास जाकर कुछ देर तक उसकी आवाज सुनी। फिर उसने अपना कान उसके लकड़ी के ढाँचे के पास लगाया।

कुछ देर बाद वह पीछे हट गया।

राजा ने पूछा, “क्या हुआ? इसे ठीक कर सकते हो?”

गोविंद ने गंभीर स्वर में कहा, “महाराज, इस घड़ी के भीतर कोई साधारण खराबी नहीं है। इसके अंदर का मुख्य पहिया जानबूझकर जाम किया गया है।”

राजा चौंक गया।

“क्या कहना चाहते हो? क्या किसी ने इसे खराब किया है?”

गोविंद ने उत्तर दिया, “जी महाराज। लेकिन एक बात और है। इस घड़ी का एक विशेष सुरक्षा यंत्र भी है। जब इसका मुख्य पहिया रोका जाता है, तो महल के नीचे बने पुराने दरवाजे की कुंडी धीरे-धीरे खुलने लगती है।”

राजा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

दरबार में मौजूद महामंत्री रुद्रसेन हँस पड़ा।

“महाराज! यह बूढ़ा अपनी प्रसिद्धि के लिए मनगढ़ंत बातें कर रहा है।”

गोविंद ने कहा, “महाराज, मुझे महल के नीचे बने पुराने कक्ष की जाँच करने दीजिए।”

लेकिन महामंत्री तुरंत बोल उठा, “इसका मतलब है कि यह महल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है। ऐसे व्यक्ति को तुरंत बंदी बना लेना चाहिए।”

राजा ने बिना जाँच किए आदेश दे दिया।

“इसे जेल में डाल दो। सुबह निर्णय लिया जाएगा।”

गोविंद को बंदी बना लिया गया।

महल में छिपा हुआ रहस्य

उसी रात महल में राजकुमारी चंद्रिका अपने कक्ष में सो रही थी।

महामंत्री रुद्रसेन लंबे समय से राजगद्दी हथियाने की योजना बना रहा था। उसने कुछ सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया था। उसकी योजना थी कि रात के तीसरे पहर पुराने भूमिगत रास्ते से महल में प्रवेश करके राजा को बंदी बना लिया जाए।

उसने ही विशाल घड़ी के मुख्य पहिए को जाम करवाया था।

लेकिन उसे यह नहीं पता था कि घड़ी का सुरक्षा यंत्र सक्रिय हो चुका है।

रात के लगभग बारह बजे महल के नीचे से एक हल्की आवाज आई।

राजकुमारी की दासी ने आवाज सुनी और पहरेदारों को सूचना दी।

पहरेदार पुराने दरवाजे की ओर दौड़े, लेकिन तब तक उसकी कुंडी आधी खुल चुकी थी।

कुछ सैनिक भूमिगत रास्ते से भीतर प्रवेश कर चुके थे।

महल में अफरा-तफरी मच गई।

राजा को जब सूचना मिली, तो वह तुरंत तलवार लेकर बाहर आया। लेकिन दुश्मन सैनिकों की संख्या अधिक थी।

महामंत्री रुद्रसेन भी राजा के पास पहुँचा और बोला, “महाराज, चिंता मत कीजिए। मैं सब संभाल लूँगा।”

लेकिन उसी समय एक सैनिक ने आकर बताया कि राजकुमारी अपने कक्ष से गायब हैं।

राजा के हाथ से तलवार छूटते-छूटते बची।

“मेरी बेटी कहाँ है?”

किसी के पास उत्तर नहीं था।

बूढ़े घड़ीसाज़ की असली बुद्धिमानी

उधर जेल में बंद गोविंद ने महल से आती हलचल सुन ली थी।

वह जेल के पहरेदार से बोला, “मुझे तुरंत राजा के पास ले चलो। राजकुमारी खतरे में हैं।”

पहरेदार ने गुस्से से कहा, “तुम्हारी वजह से पहले ही बहुत परेशानी हो चुकी है। अब चुपचाप बैठो।”

गोविंद ने अपनी जेब से एक छोटा-सा पीतल का पुर्जा निकाला।

वह पुर्जा उसने घड़ी की जाँच करते समय निकाल लिया था। उसे समझ आ गया था कि घड़ी में छेड़छाड़ करने वाला व्यक्ति सुरक्षा यंत्र की पूरी जानकारी नहीं रखता।

उसने पहरेदार से कहा, “यदि तुमने मुझे बाहर नहीं निकाला, तो सुबह तक राजकुमारी को ढूँढ़ना मुश्किल हो जाएगा।”

पहरेदार घबरा गया और उसे राजा के पास ले गया।

गोविंद ने राजा से कहा, “महाराज, महल के पुराने भूमिगत रास्ते में एक दूसरा निकास भी है। वह रास्ता राजकुमारी के पुराने अध्ययन कक्ष के पीछे खुलता है। संभव है कि उन्हें वहीं ले जाया गया हो।”

राजा ने तुरंत सैनिकों को उसके साथ भेज दिया।

गोविंद ने रास्ते में दीवार पर लगे पुराने पत्थरों को ध्यान से देखा। उसने एक विशेष निशान पहचाना और एक पत्थर को दबाया।

दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया।

अंदर से रोने की आवाज सुनाई दी।

राजकुमारी चंद्रिका वहीं एक छोटे कक्ष में बंद थीं।

सैनिकों ने दरवाजा तोड़ा और उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

राजा अपनी बेटी को देखकर भावुक हो गया।

लेकिन खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ था।

महामंत्री रुद्रसेन भागने की कोशिश कर रहा था। गोविंद ने राजा को बताया कि महल के पुराने सुरक्षा यंत्र को फिर से सक्रिय किया जा सकता है।

उसने घड़ी के भीतर से निकाला हुआ पीतल का पुर्जा राजा को दिखाया और सैनिकों को पुराने नियंत्रण कक्ष तक पहुँचने का रास्ता बताया।

कुछ ही देर में महल के सभी गुप्त दरवाजे बंद हो गए। रुद्रसेन और उसके साथी सैनिक भीतर ही फँस गए।

उन सभी को बंदी बना लिया गया।

राजा की सबसे बड़ी भूल

अगली सुबह राजा ने पूरे दरबार को बुलाया।

गोविंद को सम्मान के साथ सिंहासन के सामने खड़ा किया गया।

राजा ने कहा, “कल मैंने तुम्हारी बात सुने बिना तुम्हें अपराधी समझ लिया। तुम्हारी बुद्धिमानी ने मेरी बेटी और मेरे राज्य को बचा लिया। मुझे क्षमा कर दो।”

गोविंद ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, मैं तो अपना कर्तव्य निभा रहा था। लेकिन एक विनती है।”

राजा ने पूछा, “क्या चाहते हो?”

गोविंद बोला, “राज्य में किसी भी व्यक्ति को केवल उसके कपड़ों, उम्र या हैसियत से मत परखिए। कल तक मैं एक साधारण बूढ़ा कारीगर था। आज मेरी बात सही साबित हुई, इसलिए सब मेरा सम्मान कर रहे हैं। लेकिन मेरी बात कल भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।”

राजा कुछ देर शांत रहा।

फिर उसने घोषणा की कि गोविंद को राजकीय घड़ीसाज़ नियुक्त किया जाएगा और राज्य के सभी पुराने कारीगरों को उचित सम्मान और अवसर दिया जाएगा।

गोविंद ने वह पद स्वीकार तो किया, लेकिन अपनी छोटी दुकान बंद नहीं की।

वह हर शाम अपनी दुकान पर लौटता और जरूरतमंद लोगों की घड़ियाँ बिना पैसे लिए ठीक करता।

एक दिन राजकुमारी ने उससे पूछा, “बाबा, आपको कैसे पता चल जाता है कि कौन-सी घड़ी खराब है?”

गोविंद मुस्कराया और बोला,

“बेटी, घड़ी की सुइयाँ देखने से केवल समय पता चलता है, लेकिन उसकी आवाज सुनने से उसकी परेशानी पता चलती है। यही बात इंसानों पर भी लागू होती है। किसी को समझने से पहले उसकी बात सुनना जरूरी है।”

राजकुमारी ने यह बात जीवन भर याद रखी।

सीख

किसी की बात को उसकी हैसियत देखकर अनसुना मत करो। कई बार सबसे साधारण दिखाई देने वाला व्यक्ति भी वह सच जानता है, जिसे बड़े-बड़े बुद्धिमान लोग नहीं देख पाते।

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